अमेरिका और चीन के वित्तीय बाजारों में श्रेष्ठता: कौन है आगे?

चीन का निर्यात और व्यापार अधिशेष: टैरिफ झटकों के बीच मजबूती

हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे के दौरान, यह स्पष्ट हुआ कि टैरिफ के प्रभावों के बावजूद चीन की निर्यात क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पिछले महीने चीन के निर्यात ने वार्षिक आधार पर 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जिससे देश का व्यापार अधिशेष 119 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। यह वृद्धि चीन को पिछले वर्ष के रिकॉर्ड 1.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के व्यापार अधिशेष के पार ले जाने की दिशा में अग्रसर कर रही है।

विशेष रूप से, चीन का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष 44 प्रतिशत बढ़कर 29 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद का सबसे बड़ा अंतर है। यह संकेत देता है कि चीन की निर्यात मशीन ने वैश्विक व्यापार युद्ध के दौरान मजबूती से अपनी स्थिति बनाए रखी है।

वित्तीय बाजारों में अमेरिका की विशिष्टता

वित्तीय बाजारों के संदर्भ में, अमेरिका की स्थिति चीन की तुलना में जटिल और गहरी है। अमेरिकी डॉलर विश्व की प्रमुख आरक्षित मुद्रा है और अमेरिका के पूंजी बाजार सबसे बड़े, तरल और पारदर्शी माने जाते हैं। MSCI ऑल-कंट्री वर्ल्ड इंडेक्स में अमेरिकी बाजार का हिस्सा लगभग दो-तिहाई है, जबकि वैश्विक बॉन्ड बाजार में इसका योगदान 40 प्रतिशत से अधिक है। ये तथ्य अमेरिका को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में एक अनिवार्य भूमिका प्रदान करते हैं।

इसके विपरीत, चीन के वित्तीय बाजारों की वैश्विक पहुंच और तरलता अभी अमेरिका के स्तर तक नहीं पहुंची है। हालांकि, चीन ने दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के उत्पादन और निर्यात को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालने की अपनी क्षमता प्रदर्शित की है, जो उसकी आर्थिक ताकत को दर्शाता है।

भारत के लिए निहितार्थ

भारत के लिए यह वैश्विक वित्तीय और व्यापारिक परिदृश्य महत्वपूर्ण अवसर और चुनौतियां दोनों प्रस्तुत करता है। चीन की निर्यात क्षमता में वृद्धि और व्यापार अधिशेष के विस्तार से भारत को चीन+1 रणनीति के तहत विनिर्माण और निर्यात में अवसर मिल सकते हैं। भारत की घरेलू विनिर्माण नीतियों, जैसे ‘मेक इन इंडिया’, को मजबूत करने के लिए यह समय उपयुक्त है ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भागीदारी बढ़ सके।

साथ ही, अमेरिका के वित्तीय बाजारों की गहराई और डॉलर की वैश्विक प्रभुसत्ता को देखते हुए, भारत को अपनी मुद्रा और वित्तीय बाजारों की स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क रहना होगा। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक सुरक्षा के लिए दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा।

निष्कर्ष

वित्तीय बाजारों और व्यापार के संदर्भ में अमेरिका और चीन दोनों की अपनी-अपनी ताकतें हैं। चीन ने निर्यात और व्यापार अधिशेष के मामले में मजबूती दिखाई है, जबकि अमेरिका के पास वित्तीय बाजारों की गहराई और डॉलर की वैश्विक भूमिका है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह वैश्विक आर्थिक बदलावों के अनुरूप अपनी नीतियों को अनुकूलित करे, जिससे वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर सके और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित कर सके।


स्रोत:
South China Morning Post

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