चीन-ईयू व्यापार वार्ता में तनाव और जर्मन उद्योग की प्रतिक्रिया
चीन और यूरोपीय संघ के बीच आगामी व्यापार वार्ता को लेकर अनिश्चितता के चलते जर्मन कंपनियां दुर्लभ पृथ्वी धातुओं सहित महत्वपूर्ण कच्चे माल का भंडारण बढ़ा रही हैं। यूरोपीय संघ के व्यापार प्रमुख मारोश शेफकोविक की बीजिंग यात्रा के दौरान व्यापार घाटे को कम करने की कोशिशों के बीच, चीन द्वारा संभावित निर्यात प्रतिबंधों का खतरा उद्योग जगत में चिंता बढ़ा रहा है।
चीन ने हाल ही में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के निर्यात नियंत्रणों को जनवरी तक बढ़ाने का निर्णय लिया है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधान की आशंका और गहरी हुई है। जर्मन उद्योग विशेषज्ञ इस स्थिति को लेकर सतर्क हैं क्योंकि चीन दुर्लभ पृथ्वी खनन और परिष्करण में वैश्विक प्रभुत्व रखता है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टरबाइन, डेटा सेंटर और रक्षा उपकरणों के लिए अनिवार्य हैं।
दुर्लभ पृथ्वी तत्वों पर चीन का प्रभुत्व और यूरोप की चुनौती
चीन खनन में लगभग 60% और परिष्करण में 90% हिस्सेदारी रखता है, जिससे यूरोपीय उद्योग की चीन पर निर्भरता अत्यधिक है। पिछले वर्ष चीन द्वारा लगाए गए निर्यात नियंत्रणों ने यूरोपीय ऑटोमोबाइल उद्योग सहित कई क्षेत्रों में उत्पादन में बाधा डाली थी। इस प्रकार की निर्भरता यूरोप के लिए आर्थिक और औद्योगिक संकट का कारण बन सकती है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, यदि चीन पूर्ण रूप से निर्यात नियंत्रण लागू करता है, तो यूरोप और अमेरिका को प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान में 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का खतरा है। यह स्थिति भारत जैसे देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता और स्थिरता की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
यूरोपीय संघ की रणनीतियाँ और भारत के लिए अवसर
यूरोपीय आयोग ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला की संवेदनशीलता कम करने के लिए कई पहलें शुरू की हैं, जिनमें महत्वपूर्ण खनिजों की खरीद और भंडारण शामिल हैं। यूरोपीय संघ ने 2030 तक अपनी खपत का 10% घरेलू स्तर पर निकालने और 40% प्रसंस्करण का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा, जर्मनी में बीएमडब्ल्यू जैसे उद्योग समूह एक साझा खनिज ट्रेडिंग हाउस स्थापित करने की योजना बना रहे हैं, जो सामूहिक खरीद के माध्यम से बाजार में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सके।
भारत के लिए यह स्थिति एक अवसर प्रदान करती है कि वह अपनी ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूत करते हुए दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और अन्य महत्वपूर्ण कच्चे माल के उत्पादन और प्रसंस्करण में निवेश बढ़ाए। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच, भारत अपनी भौगोलिक स्थिति, संसाधन क्षमता और तकनीकी विकास के माध्यम से एक वैकल्पिक केंद्र के रूप में उभर सकता है।
आगे की राह: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता और रणनीतिक स्वायत्तता
चीन के साथ व्यापार विवादों के बीच यूरोपीय नीति निर्माता अनुशासन बनाए रखने और बातचीत को पेशेवर स्तर पर रखने की सलाह देते हैं। हालांकि, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों पर निर्भरता कम करना एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसके लिए तत्काल अन्य उपायों की भी आवश्यकता होगी।
भारत के लिए यह वैश्विक परिदृश्य संकेत देता है कि उसे अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा, कच्चे माल के स्रोतों में विविधता और घरेलू उत्पादन क्षमताओं के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही, यह स्थिति भारत को यूरोप और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने और वैश्विक बाजारों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करती है।
स्रोत:
Politico
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