युआन की वैश्विक उपयोगिता का विकास और हाल की चुनौतियां
रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद 2023-24 में चीन की मुद्रा युआन (रेनमिन्बी) की वैश्विक उपयोगिता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी। रूस पर लगे प्रतिबंधों और उसके व्यापारिक पुनर्गठन ने युआन को एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक लाभ दिया। हालांकि, इस तेजी के बावजूद, पिछले दो वर्षों में युआन के वैश्विक भुगतान में हिस्सेदारी में गिरावट आई है, जो इस मुद्रा की बढ़ती पकड़ के लिए एक चुनौती है।
चीन की क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक भुगतान प्रणाली (CIPS) युआन के लिए एक उज्जवल पहलू है, जहां वैश्विक बैंक इस प्रणाली से जुड़ रहे हैं। लेकिन हांगकांग के क्लियरिंग हाउस ऑटोमेटेड ट्रांसफर सिस्टम (CHATS) में युआन आधारित लेनदेन में गिरावट आई है, जो CIPS की तुलना में तीन गुना अधिक भुगतान करता है। इसके अलावा, SWIFT नेटवर्क में युआन की हिस्सेदारी भी 2024 के मध्य के उच्च स्तर से कम हुई है। इन मापदंडों के आधार पर युआन विश्व की छठी सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली भुगतान मुद्रा बन गई है, जो कनाडाई डॉलर से भी पीछे है।
चीन की रणनीति और वैश्विक मुद्रा पर प्रभाव
चीन ने लंबे समय से युआन को एक प्रमुख वैश्विक मुद्रा बनाने का लक्ष्य रखा है ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम किया जा सके। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2023 में चीन को एक “मजबूत वित्तीय देश” बनाने और युआन को वैश्विक आरक्षित मुद्रा के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा व्यक्त की। हालांकि, चीन के लिए यह चुनौतीपूर्ण रहा है कि वह मुद्रा की वैश्विक स्वतंत्रता और घरेलू पूंजी नियंत्रण के बीच संतुलन बनाए।
SWIFT नेटवर्क में युआन की हिस्सेदारी 2010 से 2015 के बीच बढ़ी, लेकिन इसके बाद 2 प्रतिशत के आसपास स्थिर रही। 2023 के अंत में रूस पर प्रतिबंधों के कारण युआन की हिस्सेदारी 4.7 प्रतिशत तक पहुंच गई, लेकिन इसके बाद यह फिर से गिरकर लगभग 2.75 प्रतिशत हो गई। यह गिरावट इस बात का संकेत हो सकती है कि युआन भुगतान अब CIPS के माध्यम से हो रहे हैं, जो SWIFT नेटवर्क से अलग है।
भारत के लिए संभावित अवसर और जोखिम
भारत के लिए इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए, युआन की वैश्विक उपयोगिता में आई इस अस्थिरता को एक संकेत के रूप में देखा जा सकता है कि वैश्विक मुद्रा परिदृश्य में अभी भी अमेरिकी डॉलर की प्रधानता बरकरार है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी मुद्रा और वित्तीय प्रणालियों के वैश्विक संपर्क को मजबूत करे, खासकर तब जब चीन और अमेरिका के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है।
चीन की पूंजी नियंत्रण नीतियों और भुगतान प्रणालियों में स्वायत्तता की कोशिशें भारत के लिए एक अवसर हो सकती हैं कि वह अपने “मेक इन इंडिया” और डिजिटल भुगतान ढांचे को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करे। साथ ही, भारत को अपनी निर्यात और आयात प्रणाली में विविधता लाने के लिए चीन+1 रणनीति को और सशक्त बनाना होगा ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
निष्कर्ष
युआन की वैश्विक मुद्रा के रूप में बढ़ती भूमिका में हाल की मंदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की पकड़ अभी भी मजबूत है। चीन की अपनी भुगतान प्रणालियों के विकास के बावजूद, युआन का वैश्विक उपयोग अभी भी सीमित है। भारत को इस परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए अपनी आर्थिक और वित्तीय रणनीतियों को तैयार करना होगा ताकि वह वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत कर सके।
स्रोत:
Peterson Institute for International Economics (PIIE)
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